भारत के प्रसिद्ध वित्त मंत्री हुए अरुण जेटली उनको एक बार मैं सुन रहा था तब उन्होंने समझाया कि-
- यदि मांग है तो आपूर्ति होगी इसका कोई अर्थ नहीं कि आपूर्ति किस प्रकार से होगी वैध होगी या अवैध होगी लेकिन आपूर्ति होगी।
- अर्थशास्त्र का यही नियम है यदि मांग है तो आपूर्ति होगी
- यदि वह वैध रूप से नहीं हो रही है तब उसकी अवैध आपूर्ति / चौर्यपरण/ Smuggling होगी लेकिन आपूर्ति होगी।
- परिणाम स्वरूप गुप्त या काली अर्थव्यवस्था Black Economy वहां पर संबद्ध होगी लेकिन आपूर्ति होगी।
अरावली की मूल समस्या यही अवैध खनन है जिसके परिणाम स्वरूप इसके पारिस्थितिकी तंत्र पर चिंता व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार के पक्ष का संज्ञान लेने के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आया है।
एक उदाहरण के माध्यम से इसको समझते हैं-
- दिल्ली सीमा क्षेत्र में पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष स्थावर संपत्ति अर्थात भूमि-भवन अचल संपत्ति /Real Estate के व्यापार में 24% की वृद्धि दर्ज हुई है।
- पिछले 5 वर्षों के अंतराल पर संपत्ति के विक्रय मूल्य में 81% की वृद्धि हो चुकी है।
- यह स्पष्ट संकेत है कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी सीमा क्षेत्र में जनसंख्या आव्रजन तीव्र गति का हो रहा है
- इसके मूल कारण में एक कारण आंचलिक क्षेत्रीय विकास /Regional Development का समान एवं संतुलित रूप से न होना है।
- परिणाम स्वरूप भारत का एक क्षेत्र आर्थिक रूप से अधिक प्रगतिशील जैसे कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तथा दूसरा क्षेत्र जैसे कि बिहार, उड़ीसा एवं पश्चिम बंगाल आर्थिक रूप से कम प्रगतिशील क्षेत्र में परिवर्तित हो चुके हैं जिस कारण से कम विकसित क्षेत्र से अधिक विकसित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आव्रजन हो रहा है। अब निश्चित है कि भवन/ House/ Enclave की मांग अप्रत्याशित रूप से बढ़ेगी।
- राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थावर संपत्ति/ Real Estate का कुल व्यापार 1.54 लाख करोड रुपए का है।
भवन निर्माण के लिए दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण वस्तुओं में
- प्रथम लोहा/ Iron तथा
- दूसरा बजरी/ Gravel & Sand है।
NOTE- यह बजरी ही इस राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मे अरावली क्षेत्र मे होने वाले खनन से पहुंचती है।
अब चुकी अर्थशास्त्र के नियम के अनुसार मांग आपूर्ति से कई गुना अधिक है तो यह अवैध खनन के लिए मार्ग प्रशस्त करता हैं जिसके परिणाम स्वरूप अरावली की ऊंचाई, उसका क्षेत्र एवं पारिस्थितिकी तंत्र दिन प्रतिदिन की गति से सिकुड़ता चला जा रहा है।
हम जानते हैं अरावली के पश्चिम में थार तथा अरब के मरुस्थल है तथा अरावली के पूर्व में भारत का उष्णकटिबंधीय मानसून जलवायु क्षेत्र/ Tropical Monsoon Zone Climate है इस प्रकार अरावली दोनों जलवायु क्षेत्र के मध्य है एक कटिबंध क्षेत्र के रूप में कार्य करती है।
यदि हम पारितंत्र क्षेत्र / Ecosystem Zone की परिभाषा में जाते हैं तब -
"प्राकृतिक क्षेत्र पर्यावरण के जैविक तथा अजैविक घटकों के मध्य एक निश्चित ऊर्जा मात्रा का अदान-प्रदान पारितंत्र के अंतर्गत होता है जिसके माध्यम से पारितंत्र अपने अस्तित्व को बनाए रखता है उस स्थान का पारितंत्र कहलाता है।"
- सरिस्का बाघ अभ्यारण Sariska Tiger Reserve,
- रणथंबोर राष्ट्रीय उद्यान Ranthambore National Park तथा
- माउंट आबू पक्षी अभयारण्य/ Mount Abu Wild Life Sanctuary अरावली पर्वत श्रृंखला के मध्य स्थित प्रमुख जैव विविधता तप्त स्थल क्षेत्र है।
अर्थात निश्चित है कि अवैध खनन अरावली को अनावश्यक तथा अप्राकृतिक रूप से हानि पहुंचा रहा है जिसका परिणाम पारितंत्र विघटन/ Ecosystem Depletion के रूप में हमको मिलेगा।
इसके संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा निर्णय दिया गया जिसमें निर्णय देते समय प्राथमिक रूप से निम्नलिखित पक्षों को ध्यान में रखा गया।
- प्रथम अरावली का विस्तार चार राज्य में है जैसे कि गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली एवं वहां खनन के लिए एक निश्चित परिभाषा को निर्धारित करना।
- नवीन खनन पर रोक लगाना।
- विनियमन / Regulation के माध्यम से खनन को वैध नियमों के अंतर्गत अनुमति देना।
नवीन परिभाषा को निर्धारित करते हुए
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मानक को माना कि-
- अरावली क्षेत्र में ऐसी पहाड़ियां जिनकी ऊंचाई 100 मीटर अथवा से कम है उनका मूल अरावली पर्वत श्रृंखला का भाग नहीं माना जाएगा और वहां पर खनन की अनुमति दी जा सकती है।
- यही मूल रूप से विवादित पक्ष है कि ऊंचाई का निर्धारण किस आधार पर किया जाएगा क्योंकि यहां समुद्र तल से ऊंचाई मापन का प्रावधान नहीं है।
- निर्णय में कहां गया निकटवर्ती भूमि स्थलाकृति के आधार पर ऊंचाई का मापन किया जाएगा।
- निकटवर्ती भूमि स्थल का मानक निर्धारित नहीं किया।
यही वह बिंदु था जिस पर विवाद हो गया और अरावली के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए विरोध विचार एवं विरोध प्रदर्शन होने लगे।
अब इस पर अंततः पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव जी का स्पष्टीकरण आया है जिन्होंने बताया गया है कि ऊंचाई को उस पहाड़ी के आधार तल / Base Point से मापा जाएगा अर्थात जहां तक उसकी नींव है वहां से उसकी ऊंचाई को मापा जाएगा और जो स्थलाकृतियां इस मानक को पूर्ण नहीं करती है अब अरावली पहाड़ी या अरावली पर्वत श्रंखला परिभाषा परिधि क्षेत्र से बाहर होंगे।
- वार्षिक वन रिपोर्ट/ Indian State of Forest
- भारतीय भू सर्वेक्षण संस्थान/ Indian Geological Survey तथा
- केंद्रीय सशक्ति समिति/ Central Empowered Committee के विनियमन एवं
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के उपरांत अब केवल 0.19% अर्थात 217 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र ही अरावली में खनन के लिए खुला है वह भी कठोर विनियमन के साथ।
राजनीतिक विरोध
होना स्वाभाविक है-
- इस समय जो शासन में है वह रक्षात्मक मुद्रा में है और जो विपक्ष में है वह आक्रामक मुद्रा में है,
- लेकिन यदि भ्रष्टाचार हुआ है तो उसकी आर्थिक लाभ सब में बटा है।
इन सभी विरोध एवं समर्थन के पक्ष मे मूल विषय यह है कि अरावली में अवैध खनन रुकना चाहिए।
सर्वोच्च
न्यायालय के नवीनतम निर्णय-
- क्योंकि अब अरावली को लेकर देश में, मुख्य रूप से राजस्थान, में व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
- इसीलिए 31 दिसंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में "नव निर्धारित परिभाषा" एवं अरावली विरोध प्रदर्शनों का, अनुच्छेद 142 के अंतर्गत स्वत संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली परिक्षेत्र में खनन तथा खनन के लिए दिए जाने वाले नवीन पट्टो पर रोक लगते हुए स्थगित अवस्था में कर दिया गया है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को "एक नवीन अधिकार प्राप्त समिति Centraled Emporwered committee" का निर्माण कर विषय को और संपूर्णता एवं समग्रता के साथ देखने का निर्णय लिया है जिससे कि अरावली को संरक्षित करते हुए एक सतत निर्णय लिया जा सके।
अब हम आशा कर सकते हैं की अवैध खनन कठोर एवं दंडात्मक कार्यवाही के साथ रुक जाएगा।
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